संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि-) जो प्रतिलोम (नीचवर्ण पुरुष से उच्चवर्णा स्त्री में) और अनुलोम (उच्चवर्ण पुरुष से नीचवर्णा स्त्री में) क्रम से उत्पन्न होने वाली परस्परमिश्रित जो “सङ्कीर्ण” योनियाँ अर्थात् वर्णसङ्कर जातियाँ हैं; उन्हें (मैं) ` विशेष रूप से कहुँगा।
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