वैश्योऽ जीवन्स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्याऽपि वर्तयेत् ।
अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ।।
अपने धर्म (१०।७८, ८९) से जीवन निर्वाह कर सकने वाला वैश्य न्निषिद्ध कर्मो का त्याग करता हुआ अर्थात् द्रिज-सेवादि करते समय जूठा आदि नहीं ख्वाता हुआ शूद्र की वृत्ति (द्विज-सेवा) से जीविका करे और समर्थ होकर अर्थात् अभापत्काल के दूर हो जाने पर (उस शूद्र कर्म से) निवृत्त हो जाय।
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