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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 104
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति ततस्ततः । आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ।।
जीविका के नहीं मिलने से संशयित प्राणों वाला जो (ब्राह्मणादि) जहाँ-तहाँ (अनुलोम एवं प्रतिलोम आदि हीन जाति वाले) से भी अन्न को खाता है, वह पङ्क से आकाश के समान पाप से लिप्त (दूषित) नहीं होता है।
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