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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 116
विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्य विपणिः कृषिः । धृतिभैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः ।।
(१) विद्या (वेद-वेदाङ्गादि का तथा वैद्यक, तर्क, विष-निराकरण आदि की विद्या) (२) शिल्प (वस्र-तैलादि को सुगन्धित करना), (३) भृति (दूतादि बनकर वेतन लेना) (४) सेवा (दूसरे की दासता नौकरी करना), (५) गोरक्षण (गौ तथा अन्य पशुओं का पालन-संवर्धन आदि), (६) व्यापार, (७) खेती, (८) धैर्य (थोड़े धन से भी सन्तोष से निर्वाह करना), (९) भिक्षा-समूह और (१०) सूद, ये दस जीवन-निर्वाह के हेतु हैं।
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