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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 106
श्वमांसमिच्छन्नार्तो$ तु धर्माधर्मविचक्षणः । प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान्‌ ।।
धर्म तथा अधर्म (के गुण तथा दोष) को जानने वाले “वामदेव" ऋषि भूख से पीड़ित होकर प्राणों की रक्षा के लिए कुत्ते के मांस को खाने की इच्छा करते हुए भी (पाप से) लिप्त (दूषित) नहीं हुए।
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