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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 46
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः । ते निन्दितैर्वर्तयेयुरद्धि जानामेव कर्मभिः ।।
द्विजो में (पिता के उच्चवर्ण होने से) जो 'अपसद' (१०।१०) अनुलोमज तथा (पिता के नीचवर्ण होने से) जो 'अपध्वंसज' प्रतिलोमज पुत्र हैं; उन सभी को द्विजों के ही (उपकारक) निन्दित (वक्ष्यमाण १०।४६-५६) कर्म अपनी वृत्ति के लिए करने चाहिये।
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