मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 120
धान्येऽष्टमं विशां शुल्कं विंशं कार्षापणावरम्‌ । कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ।।
राजा को आपत्तिकाल में वैश्य के धान्य में से आठवाँ भाग (विशेष आपत्तिकाल में पूर्व (९०।११८) वचन के अनुसार चौथा भाग) और सोने-चाँदी आदि में से बीसवाँ भाग (आपत्तिकाल नहीं होने पर पूर्व (७।१३०) वचन के अनुसार पचासवाँ भाग) कर लेना चाहिये और शूद्र, बढ़ई तथा अन्य कारीगरों से कोई कर नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वे तो काम (बेगार) के द्वारा ही राजा का उपकार करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें