राजा को आपत्तिकाल में वैश्य के धान्य में से आठवाँ भाग (विशेष आपत्तिकाल में पूर्व (९०।११८) वचन के अनुसार चौथा भाग) और सोने-चाँदी आदि में से बीसवाँ भाग (आपत्तिकाल नहीं होने पर पूर्व (७।१३०) वचन के अनुसार पचासवाँ भाग) कर लेना चाहिये और शूद्र, बढ़ई तथा अन्य कारीगरों से कोई कर नहीं लेना चाहिये; क्योंकि वे तो काम (बेगार) के द्वारा ही राजा का उपकार करते हैं।
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