यथा यथा हि सद्वृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः ।
तथा तथेमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिन्दितः ।।
परगुणों की निन्दा नहीं करने वाला शूद्र जैसे-जैसे शस्त्रानुकुल द्विजाचरण को करता है, वैसे-वैसे लोक में प्रशंसित होकर परलोक (स्वर्ग) को प्राप्त करता है।
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