वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।
न तौ प्रति हितान्धर्मान्मनुराह प्रजापतिः ।।
उसी (१०।७७) प्रकार वैश्यों के भी ये तीन कर्म (वेदाध्यापन, यज्ञ कराना और दान लेना) निवृत्त (वर्जित) होते हैं, ऐसी शास्त्र-मर्यादा है; क्योंकि उन दोनों (क्षत्रियो तथा वैश्यों) के प्रति उन धर्मा (वेदाध्यापन, यज्ञ कराना तथा दान लेना) को प्रजापति मनु ने ही नहीं कहा है।
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