ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।
ते सम्यगुपजीवेयुः षट्कर्माणि यथाक्रमम् ।।
जो ब्राह्मण (ब्रह्मप्राप्ति के कारणभूत) ब्रह्म-ध्यान में लीन तथा अपने कर्म में संलग्न हैं, उन्हें षट् कर्म (१०।७५) का यथावत् पालन करना चाहिए।
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