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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 63
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । एतं सामासिकं धर्म चातुर्वर्ण्येऽ ब्रवीन्मनुः ।।
अहिंसा (दूसरे को किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचाना), सत्य, अस्तेय (बिना पूछे किसी की कोई वस्तु नहीं लेना), शुद्धता (आन्तरिक अर्थात्‌ भीतरी मानसिक तथा बाह्य अर्थात्‌ शरीर आदि की स्वच्छता), इन्द्रियों को (उनके विषयों से) रोकना।
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