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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 109
प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि । प्रतिग्रहः प्रत्यवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ।।
ब्राह्मण के लिए नीचों को पढ़ाना, यज्ञ करना तथा उनसे दान लेना इन तीनों कर्मों में नीच से प्रतिग्रह (दान) लेना निकृष्ट है,-और मरने पर यही परलोक में नरक का कारण होता है अतएव जीविका-निर्वाह नहीं होने से आपत्ति में पड़े हुए ब्राह्मण को यदि नीचों को अध्यापन तथा यज्ञ कराने से भी जीवन-निर्वाह नहीं हो सके तभी उसे उन नीचों से प्रतिग्रह लेना चाहिये।
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