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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 41
स्वजातिजानन्तरजाः षट्सुता द्विजधर्मिणः । शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाः स्मृताः ।।
द्विजों (१०।४) से (विधिवत्‌ विवाहित एवं) सजातीया (अपने समान जाति वाली) तथा अनन्तर (अपने बाद की जाति वाली) स्त्रियों में उत्पन्न ६ पुत्र (ब्राह्मण से ब्राह्मणी में, क्षत्रिय से क्षत्रिया में और वैश्य से वैश्या में उत्पन्न तीन पुत्र तथा ब्राह्मण से क्षत्रिय तथा वैश्य में, क्षत्रिय से वैश्या में तीन प्रकार ३+२+१ = ६ पुत्र) द्विजधर्मा (द्विज के धर्म वाले यज्ञोपवीत संस्कार के योग्य) हैं तथा प्रतिलोमज (उच्चवर्ण वाली स्त्रियों में नीच वर्ण वाले) पुरुष से उत्पन्न “सूत, मागध, वैदेह' (१०।११) आदि जाति वाले जो पुत्र हैं; वे शूद्रो के समान धर्म वाले (यज्ञोपवीत संस्कार के आयोग्य) कहे गये हैं।
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