ते चापि बाह्यान्सुबहूंस्ततोऽप्यधिक दूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ।।
वे आयोगव (१०।१२) आदि ६ वर्णसङ्कर जाति वाले पुरुष परस्पर जाति वाली स्त्रियों में बहुत, अनुलोमज सन्तान से भी अधिक दूषित तथा (सत्कार्यो में) निन्दित सन्तानों को उत्पन्न करते हैं ।
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