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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 52
वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम्‌ । कार्ष्णायसमलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ।।
कफन इनका वस्त्र हो, फूटे बर्तनों में ये भोजन करें, इनके भूषण लोहे के बने हों और ये सर्वदा भ्रमण करते हुए रहें (एक स्थान पर बहुत दिनों तक निवास नहीं करें)।
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