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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 31
प्रतिकूलं वर्त्तमाना बाह्या बाह्यतरान्पुनः । हीनाहीनाग्प्रसूयन्ते वर्णान्पञ्जदशैव तु ।।
(द्विज प्रतिलोमजों की अपेक्षा हीन होने से) ब्राह्म प्रतिलोमज अर्थात्‌ आयोगव, क्षत्ता तथा चण्डाल (१०।१२) ये तीनों चारों वर्ण वाली स्त्रियो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्या तथा शुद्र) में और एक (आयोगवी में) कुल मिलाकर १५ प्रकार की अपने से बाह्य (सर्वकर्मबहिर्भूत) तथा हीन सन्तानों को उत्पन्न करते हैं।
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