पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।
न कथञ्चन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ।।
(क्योंकि) ये नीच जाति में उत्पन्न मनुष्य पिता के, माता के या दोनों के शील को प्राप्त करते हैं, वे अपने स्वभाव को किसी प्रकार नहीं छिपा सकते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।