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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 102
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद्ब्राह्मणस्त्वनयं गतः । पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ।।
(जिविका नहीं मिलने से) आपत्ति में पड़ा हुआ ब्राह्मण सब से (नीच से भी) दान ग्रहण करे; क्योंकि आपत्ति में पड़ा हुआ पवित्र (गङ्गाजल, ब्राह्मणादि नाली के पानी से या निषिद्धाचरण से) दूषित होता है यह (शास्त्र) संगत नहीं होता है।
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