तपोबीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे ।
उत्कर्ष चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ।।
वे (१०।४१ में वर्णित सजातीय वर्णो से उत्पन्न तीन तथा अनन्तर जातीय वर्णों से अनुलोम क्रम से उत्पन्न तीन-कुल ६ प्रकार के) पुत्र तपस्या तथा वीर्य के प्रभावों से (तपस्या के प्रभाव से विश्वामित्र के समान तथा वीर्य के प्रभाव से ऋष्यशृङ्ग के समान) मनुष्यों में श्रेष्ठ तथा नीच जाति को प्राप्त करते हैं।
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