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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 118
चतुर्थमाददानोऽपि क्षत्रियो भागमापदि । प्रजा रक्षन्परं शक्त्या किल्बिषात्प्रतिमुच्यते ।।
(राजा को प्रजा के धान्य का पष्ठांश या अष्टमांश या द्वादशांश लेने का शास्त्रसम्मत (७।१३ ०) विधान होने पर भी) आपत्ति काल में (उतना कर लेने से राज्यकार्य चलना असम्भव होने पर) प्रजा के धान्य का चतुर्थांश लेता हुआ और यथाशक्ति प्रजाओं की रक्षा करता हुआ राजा अधिक कर लेने के पाप से छूट जाता (दूषित नहीं होता) है।
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