(राजा को प्रजा के धान्य का पष्ठांश या अष्टमांश या द्वादशांश लेने का शास्त्रसम्मत (७।१३ ०) विधान होने पर भी) आपत्ति काल में (उतना कर लेने से राज्यकार्य चलना असम्भव होने पर) प्रजा के धान्य का चतुर्थांश लेता हुआ और यथाशक्ति प्रजाओं की रक्षा करता हुआ राजा अधिक कर लेने के पाप से छूट जाता (दूषित नहीं होता) है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।