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मनुस्मृति • अध्याय 10 • श्लोक 111
जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम्‌ । प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ।।
नीचों को पढ़ाने तथा यज्ञ करने से उत्पन्न पाप (गायत्री आदि मन्त्रो के) जप तथा हवन से नष्ट हो जाता है; किन्तु नीच के दान लेने से उत्पन्न पाप उस दान लिये गये पदार्थ के त्याग तथा आगे (१०/११२) कहे जाने वाले तप से नष्ट होता है।
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