द्विज (१०।४) द्वारा अपने समान वर्णवाली स्त्रियों से उत्पादित यज्ञोपवीत संस्कार के अयोग्य एवं सावित्री से भ्रष्ट पुत्रों को 'व्रात्य' कहा जाता है।
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