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अध्याय 1 — प्रथम पटल
शिव संहिता
103 श्लोक • केवल अनुवाद
इस नश्वर जगत मे एकमात्र ज्ञान ही शाश्वत और आदि-अन्त से रहित होता है। ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु जगत में विद्यमान नहीं है। संसार में इन्द्रियोपाधि द्वारा जो कुछ भी भिन्नभित्र रूपों में भासित होता है वह केवल ज्ञान का ही आलोक है। अर्थात् ज्ञान से परे कुछ भी नहीं है।
मैने भक्तों पर अनुग्रह करने के अभिप्राय से इस योगानुशासन का कथन किया है। समस्त प्राणियों का आत्म परमेश्वर ही केवल मोक्षप्रदायक होता है।
सभी विवादास्पद मतो और दुर-ज्ञान के मूलभूत कारणों का परित्याग करके आत्मज्ञान का आश्रय ग्रहण करना चाहिए। समस्त जीवों के हितार्थं यही अनन्य गति है।
कुछ लोग सत्य की सराहना करते है तो कुछ लोग तपश्चर्या की। इसके विपरीत कुछ व्यक्ति शुद्धाचरण, क्षमाशीलता, सरलता तथा सभी जीवों मे समत्व की भावना रखना ही श्रेयस्कर समझते हैं।
किन्तु कोई-कोई दानशीलता, पितृ कर्मानुष्ठान (तर्पण, श्राद्धादि कर्म) तथा सगुणोपासना के प्रशंसक हुआ करते हैँ। इसके अतिरिक्त कुछ मनुष्य मोह-माया से विरत होकर मन मेँ वैराग्य धारण करना ही श्रेष्ठ मानते हैँ।
कुछ बुद्धिमान पुरुष गार्हस्थ्य धर्म तथा अग्निहोत्र कर्म (आवासस्थल में निरन्तर अग्नि जलाये रखना) के प्रशंसक होते है।
कुछ विद्वानों के मतानुसार मन्त्रजाप तथा तीर्थस्थान का भ्रमण करना ही मोक्ष का कारण बनता है। इस प्रकार अपने-अपने अभिमत के अनुसार लोगों ने मुक्ति के अनेक साधन बतलाये हैं।
इसी भाँति विधिनिषेध कर्मों (करणीय-अकरणीय कर्म) के मर्मज्ञ व्यक्ति पापकर्मों से विमुख रहकर भी माया के भ्रमजाल में पड़े रहकर पाप-पुण्य के अनुष्ठानरूप उक्त मतों का सहारा लेते रहते हैं।
जिसके फलस्वरूप अनुष्ठानकर्ता बार-बार आवागमन के चक्रव्यूह में फँसकर संसार में परिभ्रमित होता रहता है। अर्थात् अभिप्राय यह है कि शुभ कार्यों के सम्पादन से चित्त का शुद्धिकरण तो सम्भव हो जाता है किन्तु मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होना कदापि सम्भव नहीं होता।
कुछेक विद्वान गुप्तशास्त्रों में अध्ययनरत रहने को ही उत्तम मानते हैं, किन्तु कुछ मनुष्यों की ऐसी अवधारणा होती है कि आत्मा ही शाश्वतस्वरूप है और वह सर्वत्र गमनशील भी है।
प्रत्यक्षवादियों के मतानुसार इस जगत में दिखायी पड़ने वाली वस्तुएँ ही केवल सत्य है, शेष सभी मिथ्या हैं। वे निश्चयतापूर्वक यही कहते हैं कि इस पृथिवी के अतिरिक्त स्वर्गादि लोक नहीं होते। कुछ विद्वानों का ऐसा अभिमत है कि प्रवहमान ज्ञानधारा ही सब कुछ है।
उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शून्यवादियों का मानना है कि जगत में शून्य के सिवाय दूसरा कुछ नहीं है। कोई-कोई प्रकृति और पुरुष को तत्त्वरूप में समझते हैं।
परमार्थविरोधी मनुष्यों की मति भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हुआ करती है और उसी मति का आश्रय लेकर वे कर्मों में निरत रहा करते हैं।
जहाँ कुछ लोग ईश्वरीय सत्ता को नहीं मानते, वहीं कुछ व्यक्ति समस्त जगत को ईश्वरमय देखते हैं। इस प्रकार अनेक लोग अनेक प्रकार के मतों का कथन करते तथा अपने-अपने मत पर अटल रहकर कार्य करते हैं।
इस प्रकार अनेक ऋषि-मुनियों ने विविध प्रकार के मत-मतान्तरों का प्रतिपादन शास्त्रों में किया है, किन्तु ऐसे शास्त्र मानव को भ्रम में डाल दिया करते हैं।
ऐसी स्थिति में मनुष्य ग्राह्य-अग्राह्य मतों का विश्लेषण नहीं कर पाता। फलतः वह जीवन पर्यन्त भ्रमित होकर भटकता रहता है और मोक्षमार्ग तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे विवादी पुरुषों का मत वर्णन करने में मैं सर्वथा ही अपने को असमर्थ पाता हूँ। अर्थात् प्राणी मुक्तिमार्ग की राह छोड़कर व्यर्थ ही इतस्ततः भटकता फिरता है।
समस्त शास्त्रावलोकन के पश्चात् यही विचार दृढ़ीभूत होता है कि योगशास्त्र ही एकमात्र परमश्रेष्ठ मत है, क्योंकि बार-बार विचारने पर यही बात सिद्ध होती है।
इस विषय में ज्ञानोपलब्धि होने पर इसके लिए परिश्रम करना उचित तथा आवश्यक है। जब इसके अतिरिक्त अन्य शास्त्र निरुद्देश्य सिद्ध होते हैं तो उन शास्त्रों में ज्ञानप्राप्ति हेतु किया जाने वाला परिश्रम भी व्यर्थ ही है।
देवी पार्वती से शिवजी कहते हैं कि मेरे द्वारा कथित यह योगशास्त्र अत्यन्त गोपनीय है। अतः इसे त्रैलोक्य में ऐसे व्यक्ति को बतलाना चाहिए जो ईश्वरभक्तिपरायण और सन्त हो।
वेद के दो भाग किये गये है, जिसमें पहला कर्मकाण्ड और दूसरा ज्ञानकाण्ड है। इनमें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के भी दो-दो भाग कर दिये गये है।
कर्मकाण्ड भी निषेधित और विधिक भेदानुसार दो प्रकार का कहा गया है। निषिद्ध कर्म करने से मनुष्य अवश्य ही पातकी कहलाता है तथा विधिक कर्म करने के फलस्वरूप वह निश्चय ही पुण्यलाभ का भागी बनता है।
विधिक कर्म तीन प्रकार के माने जाते हैं, जैसे - नित्यकर्म, नैमित्तिक कर्म और सकाम कर्म। नित्यकर्म वह है जिसके अन्तर्गत प्रतिदिन देवार्चन तथा सन्ध्या-वन्दन करने का विधान है। नैमित्तिक कर्म वह है जिसे किसी विशिष्ट पर्वकाल (ग्रहण आदि) अथवा किसी तीर्थस्थान के जलाशय में मार्जन, स्नान-दानादि के द्वारा किया जाता है, किन्तु सकाम कर्म फलप्राप्ति के उद्देश्य से सम्पत्र किये जाते हैं।
कर्मफल की प्राप्ति दो रूपों में हुआ करती है। एक है स्वर्गभोग और दूसरा है नरकभोग। ये दोनों ही अनेक प्रकार के कहे जाते हैं। इस जीव द्वारा पुण्यकार्य किये जाने पर स्वर्ग-सुख की प्राप्ति तथा पापकर्म के करने से नरकवास के कष्टों को भुगतना पड़ता है।
अर्थात् मर्त्यलोक में शरीर धारण करने पर मानव द्वारा जाने-अनजाने पाप-पुण्य कर्म होते ही रहते हैं, किन्तु उन शुभाशुभ कर्मों का पूर्ण फल जब तक भुगत नहीं लिया जाता तब तक सांसारिक आवागमन से मुक्ति नहीं मिलती, जैनदर्शन में भी इसी मत का प्रतिपादन किया गया है।
इस जीव को स्वर्गलोक की प्राप्ति होने पर उसे नाना प्रकार के सुखों का उपभोग करना पड़ता है, किन्तु नरकगामी होने पर उसे अनेक प्रकार के कठोर दुःखों की यातना भी सहनी पड़ती है।
अर्थात् पापकर्मों के द्वारा दुःख तथा पुण्यकमों के द्वारा सुखोपलब्धि होती है। अतएव सुखाभिलाषी व्यक्ति सदैव पुण्यकर्म में ही तत्पर रहा करते हैं।
जिस प्रकार पापफल का भोग भुगत लेने पर जीव का इस संसार में पुनरावर्तन होता है उसी प्रकार पुण्यफल भोग लेने के पश्चात् पुण्यात्मा जीव को भी पुनर्जन्म लेना पड़ता है। इस प्रकार जन्म-मरण का चक्र बराबर घूमता रहता है।
यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो स्वर्ग भी दुःख का ही एक स्थान है, क्योंकि स्वर्ग में पहुँचकर स्वर्गीय ललनाओं (अप्सराओं) के दर्शन तो होते हैं किन्तु उनकी प्राप्ति सम्भव नहीं होती जिसके कारण मानसिक क्लेश भोगने पड़ते हैं। अतः स्वर्गप्राप्ति भी दुःख का ही कारण है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं रखना चाहिए।
सुविज्ञ पुरुषों ने पाप-पुण्य के रूप में दो प्रकार के कर्मों की परिकल्पना की है। उन्हीं पाप-पुण्य के कर्मानुसार शरीर आबद्ध है जिसके परिणामस्वरूप जीव को संसार में बार-बार जन्म लेना पड़ता है।
मनुष्य को इहलोक तथा परलोक के फलों एवं नित्य-नैमित्तिक फलों की इच्छा का परित्याग कर केवल योगाभ्यास की साधना में निरत रहना ही मोक्षप्राप्ति का कारण बनता है।
कर्मकाण्ड की महत्ता को जान लेने के पश्चात् पाप-पुण्य के कर्मों का परित्याग कर योगसाधना में प्रवृत्त होना चाहिए। श्रुतियों का कथन है कि आत्मा ही श्रवणीय और मननीय है।
आत्मा ही मुक्तिप्रदायिनी और सभी की उत्पन्नकर्जी है। अतः प्राणी को चेष्टापूर्वक आत्मा का सेवन करना ही उचित है।
जिस बुद्धि के कारण पाप-पुण्य, इन दोनों में समान रूप से प्रेरणा मिलती है, 'वह मैं ही हूँ'- मुझसे ही इस जगत की उत्पत्ति होती है। यह समस्त दृश्यमान जगत मैं ही हूँ।
यह सब मुझसे ही उत्पन्न होता और मेरे में ही विलीन हो जाता है। मैं किसी से भित्र नहीं हूँ और न मुझसे ही कुछ भित्र है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण जगत को इसी भावना से देखना और समझना योगाभ्यासी के लिए आवश्यक है।
जिस प्रकार जल से परिपूरित घड़े में एक ही सूर्य के अनेक प्रतिविम्ब भासित होते हैं, किन्तु यथार्थतः वे अनेक न होकर केवल एक ही होते हैं। उनमें अनेकता का आभास तो मिट्टी के घड़े और उनकी संख्याओं के कारण होते हैं।
उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत भी एकात्म होते हुए भी अनेक रूपों में परिलक्षित हुआ करता है। यथार्थ में पब्रह्म भी एक ही होता है।
जिस प्रकार स्वप्नावस्था में मानव-मन में अनेक प्रकार की परिकल्पनाएँ उठती रहती है, किन्तु नींद खुल जाने पर कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, उसी प्रकार मायाग्रस्तता के फलस्वरूप जगत भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता है।
पुनः माया का आवरण हट जाने पर केवल एक ब्रह्म ही शेष रह जाता है। जिस प्रकार रस्सी में साँप और सीप में चाँदी का बोध होता है उसी भाँति पब्रह्म में माया के आवरण से जगत का भ्रम उत्पन्न होता है।
किन्तु जिस समय रस्सी के वास्तविक रूप का ज्ञान हो जाता है उस समय सर्प का मिथ्या ज्ञान दूर हो जाता है, उसी प्रकार आत्म ज्ञानोदय होने पर मिथ्या जगत की बुद्धि नहीं रह जाती।
इसी भाँति जब मन में यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि यह वस्तुतः सीप है तो उसमें चाँदी के होने वाला भ्रम नहीं रहता। इसी प्रकार आत्मबोध हो जाने पर संसार का भ्रम दूर हो जाता है।
जिस प्रकार रस्सी को साँप समझ लेने का मिथ्या ज्ञान उत्पत्र होता है उसी प्रकार संसार भी अज्ञान के वशीभूत है।
अर्थात् जगत् में विभिन्नता के रूप में होने वाला भ्रम भी रस्सी में साँप होने के भ्रम के सदृश ही होता है। यह केवल सांसारिक कल्पना ही होती है, इसमें रंचमात्र भी सत्यता नहीं रहती। किन्तु रज्जुज्ञान की तरह आत्मज्ञान के उदय होते ही मिथ्या जगत की प्रतीति नहीं होती।
जिस प्रकार पित्तविकार के कारण पाण्डुरोग (कामला रोग) हो जाने से शरीर का वर्ण पीला दिखाई देता है उसी प्रकार ज्ञानदोष के फलस्वरूप यह आत्मा भी मिथ्या जगत के रूप में जान पड़ने लगता है। इस प्रकार की अज्ञानता सहज ही नहीं मिट पाती।
अज्ञान के नाश होने पर शुद्ध ब्रह्म का बोध उसी प्रकार होने लगता है जिस प्रकार पित्तविकार के नष्ट होने पर शरीर का वर्ण भी श्वेत हो जाता है। तात्पर्य यह है कि अज्ञानरूप रोग का शमन आत्मज्ञानरूप औषध सेवन से ही सम्भव हो पाता है।
यह बात निश्चित रूप से सत्य है कि तीनों कालों में (भूत, वर्तमान एवं भविष्य) रस्सी कभी भी सर्परूप में परिवर्तित नहीं हो सकती, उसी प्रकार गुणातीत शुद्धात्मा भी कभी विश्वरूप में नहीं बदल सकता।
आत्मज्ञान-सम्बन्धी शास्त्र के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि ईश्वर की उपाधि से युक्त इन्द्रादि देव भी अनित्य हैँ अर्थात् उनका भी संसार में जन्म-मरण होता रहता है।
जिस प्रकार वायु के थपेड़ से सागर में ज्याग उठते ओर बुलबुले उत्पन्न होते रहते हैँ तथा पुनः तत्क्षण ही उसमें समा जाते है, उसी प्रकार माया की उपाधि से विभूषित आत्मा के द्वारा नश्वर संसार की उत्पत्ति होती ओर पुनः उसी आत्मा मे विलुप्त हो जाती है।
आत्मा की विभेदता किसी पदार्थ या संसार से नहीं है, किन्तु उसमें भ्रमवश ही दो-तीन इत्यादि की प्रताति होती है। इस प्रकार के भ्रम के मिट जाने पर अनेकता का भेद नहीं रह जाता।
संसार के मूर्त-अमूर्तं जो भी पदार्थ है वे सभी माया के आवरण से आत्मा द्वारा ही प्रकटित हए हैँ।
यह समस्त जगत अविद्या का ही एक काल्पनिक रूप है जिसकी नीव ही असत्य पर आधारित हो वह स्वयं सत्य किस प्रकार से हो सकता है?
इस सम्पूर्णं विश्च की उत्पत्ति केवल चेतन आत्मा के द्वारा ही होती है। ऐसा जानकर चैतन्य आत्मा का आश्रय ग्रहण करना ही विहित माना जाता है।
जिस प्रकार घट के अन्दर और बाहर आकाश परिव्याप्त रहा करता है उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तरंग और बहिरंग भाग मेँ केवल एक आत्मा ही पूर्णतया परिव्याप्त रहती है।
जिस प्रकार चराचर जगत में आकाश की परिव्याप्ति रहती है उसी प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड के अंदर और बाहर आत्मा भी व्याप्त रहता है।
अर्थात् जैसे आकाश सभी भूतो से समाविष्ट रहता है वैसे ही संसार के समग्र परादर्भूत पदार्थो मे आत्मा का समावेश रहता है।
जिस प्रकार आकाश पंचभूतात्मक होते हए भी उसमें सन्निहित नहीं रहता उसी भाँति आत्मा भी समस्त वस्तुओं में परिव्याप्त रहते हुए भी उसमें लिप्त न होकर पृथक् रूप से स्थित रहता है।
अखिल विश्च मे एक ही आत्मा परिव्याप्त है। वही एक आत्मा सच्विदानन्दस्वरूप द्वैधीभाव से रहित है। अर्थात् वह अद्वैतरूप कहा गया है।
उस अद्वैत आत्मा को प्रकाशित करने वाला कोई नहीं होता, बल्कि वह अपनी प्रभा से ही प्रकाशमान रहता है। स्वयं प्रभावान होने के फलस्वरूप ही वह ज्योतिस्वरूप होता है।
देश-काल के विचार से वह अवच्छिन्न नहीं है। अर्थात् उसमें न तो देश-कालादिकों के कोई नियम होते हैँ ओर न ही संकुचन ओर विस्तरण के। अतः आत्मा सदैव ही अपने आप में परिपूर्ण रहता है।
पंचभूतों के नष्ट हो जाने पर भी इस आत्मा का विनाश नहीं होता, क्योकि आत्मा सर्वदा ही आविनश्वर और अविकारी होता है। किसी भी अवस्था में आत्मा का नाश होना असम्भव है।
आत्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी न होने पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आत्मा ही अद्वैतरूप है। इस प्रकार जब जगत मेँ सभी पदार्थं असत्य हैँ तो केवल शुद्धात्मा को ही सत्य माना जा सकता है।
सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति में एकमात्र कारण अविधा को माना गया है। सांसारिक दुःखों के निवारण होने के पश्चत् सुखागमन माना जाता है।
किन्तु दुःख के आदिअन्त का सम्बन्ध ज्ञान से नहीं रहता। ज्ञान के द्वारा ही अज्ञान का विनष्टीकरण हुआ करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि विश्च का मूलभूत कारण ज्ञान ही है। अतः आत्मा ही ज्ञानरूप, नित्य ओर शाश्वत है।
कालानुसार अनेक रूपों वाले संसार की उत्पत्ति होती है, अतः वह एक प्रकार का आत्मा ही है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आत्मा कोई काल्पनिक वस्तु न होकर सत्यस्वरूप है।
आत्मा से अलग जो भी पदार्थ होते हैँ वे सभी समयानुसार नाश को प्राप्त हो जाया करते है। अतः आत्मा द्वैधीभाव से रहित है। उसे वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।
आत्मा अकाशरहित होने के परिणामस्वरूप निःशब्द, वायु के अभाव से स्पर्शहीन, अग्नि के अभाव से तेजहीन, जलविहीन होने के कारण रसहीन तथा पृथिवीतत्त्व के अभाव में गंधहीन भी है।
वह कारण से रहित होने के फलस्वरूप कोई कार्य भी नहीं है ओर न तो ब्रह्मादि ईश्वर ही है। वह आत्मा अपने आप में पर्णकाम है अर्थात् वह सभी कामनाओं से परे है। इस प्रकार आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मा मे झांककर देखने वाला ऐसा योगी जो सभी संकल्प-विकल्प का परित्याग कर देता है वही समाधिस्थ हो सकता है।
इस प्रकार का योगसाधक अपने आत्मा से आत्मा को आत्मा में देखता हुआ संसार को विस्मृत कर देता है ओर आनन्दस्वरूपा समाधि में तेजी से रमण करने लग जाता है।
इस सम्पूर्णं जगत की जनयित्री माया को माना गया है, क्योकि उसके द्वारा ही विश्वोत्पत्ति सम्भव है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है, यह बात सुनिश्चित है। अतः आत्मबोध होने पर इस नाशवान विश्च की पूर्णरूप से परिसमप्ति हो जाती है।
यह समस्त मिथ्या जगत केवल माया का ही हास-विलास होता है। अतः इसे सुख का साधन न मानकर इसकी प्रीति से मुँह मोड़ लेना चाहिए।
इस संसार में मुख्यतः तीन प्रकार के व्यवहार परिलक्षित होते हैं, जैसे - शत्रु, मित्र और उदासीन। इससे विलग अन्य कुछ भी नहीं है। यह समस्त संसार प्रियता-अप्रियता भेदरूप बन्धन में जकड़ा हुआ है।
इस जगत में सभी पारिवारिक सम्बन्ध (पुत्र, कलत्रादि) आत्मा की उपाधि से ही सम्भव होते हैं।
यह समस्त विश्व-प्रपंच माया के द्वारा विलसित है, ऐसा ज्ञान श्रुति-वाक्य से प्राप्त कर योगाभ्यासी अध्यारोप और अपवाद से आत्मविलीन रहते हैं।
सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति-स्थिति का एकमात्र कारण कर्म ही होता है अर्थात् कर्म के द्वारा क्लेशादि उत्पन्न होते हैं। कर्म के अभाव में किसी प्रकार के दुःख की सम्भावना नहीं रह जाती। जिस क्षण आत्मा माया की उपाधि को विजित कर मायाविहीन हो जाता है तभी उसे अखण्ड ज्ञानरूप विशुद्ध ब्रह्म की प्रतीति होने लगती है।
आत्मा अपनी इच्छा से स्वयं ही जीवों की सृष्टि करता है। ऐसी इच्छा अविद्या के फलस्वरूप उत्पन्न होती है और वह स्वभावतः मिथ्या होती है।
इसका तात्पर्य यह है कि मिथ्या माया से आविर्भूत यह सृष्टि भी मिथ्या ही है। विद्या का सम्बन्ध शुद्ध ब्रह्म में होना स्वाभाविक है और उस ब्रह्म के तेजांश से ही आकाश-मण्डल का आविर्भाव हुआ है।
आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल के द्वारा पृथिवी की उत्पत्ति हई, ऐसी कल्पना की गयी।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आकाश से वायु तथा आकाश-वायु के सम्मिलन से अग्नि की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर आकाश, वायु अग्नि - इन तीनों के संयोग से जल एवं आकाश, वायु, अग्नि तथा जल के एकीकृत होने के परिणामस्वरूप पृथिवी का आविर्भाव हुआ।
आकाश में केवल एक शब्द गुण ही विद्यमान है, किन्तु वायु के दो गुण हैं। एक चपलता और दूसरा स्पर्शशीलता। अग्नि का गुण केवल रूप और जल का गुण रस होता है।
पृथिवी में गन्ध का गुण होता है। इस प्रकार की निश्चयता में कुछ भी अन्यथा नहीं है। शास्त्रों के निर्णयानुसार ही पंचतत्त्वों में इन विशिष्ट गुणों का होना माना गया है।
इस प्रकार यह निश्चय हुआ कि आकाश में केवल एक शब्द गुण, वायु में दो गुण, अग्नि में तीन और जल में चार गुण हुआ करते हैं।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - इन पंचगुणों की वर्तमानता पृथिवी के द्वारा कल्पित की गयी है।
चक्षुओं (नेत्रों) के द्वारा रूप का ग्रहण तथा प्राण (नासिका) के द्वारा गन्ध का बोध,
जिह्वा से रस का ग्रहण, त्वचा से स्पर्श का ज्ञान तथा कर्णेन्द्रिय से शब्द का ग्रहण किया जाता है, यह नियम निश्चित और अकाट्य है।
यह समग्र चराचर जगत एक ही चैतन्य से आविर्भूत हुआ है, ऐसी कल्पना करने से संसार की सत्यता प्रतीत होती है, किन्तु संसार के न रह जाने पर उस शुद्ध चेतन आत्मा के सिवाय अन्य कुछ भी अवशिष्ट नहीं रह जाता।
जैसे पृथिवी जल में निमग्न हो जाती और जल में अग्नि का विलय हो जाता है वैसे ही अग्नि का वायु में और वायु का आकाश में विलयन सुनिश्चित होता है। तदनन्तर वह आकाश भी अविद्या में विलीन हो जाता है और अविद्यास्वरूप माया महाकाश में पहुँचकर अर्थात् परमपद में जाकर विलुप्त हो जाती है। अर्थात् पंच भूतात्मक जगत अपने-अपने कारणों में लय को प्राप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था आने पर केवल एक ब्रह्म ही शेष रह जाता है।
परमेश्वर की दो शक्तियाँ मानी गयी हैं - एक विक्षेप और दूसरा आवरण। ये शक्तियाँ अनन्त दुःखदायिनी होती हैं। माया को त्रिगुणात्मस्वरूपा (सत्त्व, रज एवं तम) कहा गया है।
वह इन तीन गुणों में से अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी ग्रहण करती रहती है। इसी को आवरणशक्ति कहते हैं। यह शक्ति जब ज्ञानावरण धारण कर लेती है तब वह स्वतः ही अज्ञानमयी बन जाती है। पुनः यह विक्षेप स्वभावशीला शक्ति जगदाकृति का प्रदर्शन करने लगती है।
यही महामाया तमोगुण धारण करके दुर्गास्वरूपिणी बन जाती है और चेतनस्वरूप ईश्वर को उत्पन्न करती है।
यही माया जब सत्त्वगुण को ग्रहण कर लेती है तब वह दिव्यस्वरूपिणी लक्ष्मी बनकर विष्णुरूप चैतन्य का आविर्भाव करती है।
किन्तु जब यह रजोगुणप्रधान सरस्वती रूप धारण करती है तब ब्रह्मारूप चैतन्य का प्रादुर्भाव करती है। (अभिप्राय यह है कि तमोगुण की प्रबलता से यही शक्ति दुर्गास्वरूपा बनकर सृष्टि संहारक शिव को, सत्त्वगुण की बहुलता से सृष्टिपालक विष्णु को तथा रजोगुण की प्रधानता से सरस्वतीरूपा होकर सृष्टिरचयिता ब्रह्मा को उत्पन्न करती है। इस प्रकार इस शक्ति को ही जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार में मूलभूत कारण माना गया है।)
इस जगत में जितने भी नाम और रूप के देवता है वे सभी एक परमात्मा में ही दिखाई पड़ते हैं, किन्तु शरीरादि समस्त जड़ वस्तुएँ उसी एक आत्मा में अवस्थित होने के फलस्वरूप आत्मा से भिन्न जान पड़ती हैं।
सृष्टि के सम्बन्ध में विद्वानों ने इस प्रकार की कल्पना की है। संसार में सभी कुछ आत्मा से ही आविर्भूत है। अतएव आत्मा से भिन्न सभी वस्तुएँ काल्पनिक होती हैं। उसकी सत्यता को किसी ने भी स्वीकार नहीं किया है।
संसार में प्रमेयस्वरूप अर्थात् जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है उसको प्रकाशमान करने वाला केवल एक आत्मा ही है।
भिन्न-भिन्न रूपों में दृष्टिगत होने वाली वस्तुएँ उपाधि-भेद के कारण ही भिन्न प्रतीत होती है, किन्तु यथार्थतः उनमें किसी प्रकार का भेद नहीं होता। उनमें ऐसा भेद केवल विशिष्ट शब्दों के प्रयोग से ही जान पड़ता है।
एक सत्ता से परिपूरित वह आत्मा ही सम्पूर्ण स्थानों में वर्तमान रहता है। उससे पृथक् कहीं कुछ भी नहीं है, जिसने ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लिया है उसे ही जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त समझना चाहिए। ऐसे ज्ञानी पुरुष को कभी दुःख की अनुभूति नहीं होती।
आरोप-प्रत्यारोप से आविर्भूत समस्त कार्यों का ज्ञान के द्वारा विलीन हो जाना सुनिश्चित रहता है। अतः उस एक आत्मा में ही मन का विलय कर देना उचित है। अर्थात् आत्म-चिंतन में ही चित्त को सदैव लगाये रखना चाहिए।
यह जीव अपने पूर्व कर्मार्जित फलानुसार पिता के अन्नमय कोश से सुन्दर जड़ शरीर लेकर दुःखभोग रूप में उत्पन्न होता है।
मांस, अस्थि, स्नायु (नस) तथा मज्जा आदि नाड़ियों से आबद्ध शरीर भोग-मन्दिर के रूप में बनकर दुःख का कारण बनता है। तात्पर्य यह है कि यह शरीर ही दुःखरूप है। अतः मायाजाल में पड़कर शरीराभिमान करना निरर्थक है।
इस शरीर का निर्माण पंचतत्त्वों से ब्रह्मा के द्वारा किया गया है। इस ब्रह्माण्डसंज्ञक शरीर की कल्पना दुःख-सुखभोग हेतु ही की गयी है।
शिवरूप बिन्दु (वीर्य) और शक्तिरूप रज - इन दोनों के मिलन से ही यह शक्तिरूप जड़ माया अपने प्रभुत्व से स्वप्नवत् शरीरोत्पत्ति किया करती है।
इस संसार में पंचभूतों के पंचीकरण के फलस्वरूप स्थूल रूप से चराचर जगत की अनेक रूपों में सृष्टि होती है। अपने सद-असद् कर्मानुसार फलोपभोग करने के लिए ही यह जीव पंचभूतों के द्वारा निर्मित इस संसार में जन्म लेता है।
शिवजी कहते हैं कि मैं समस्त जीवों को उनके कर्मानुसार ही उत्पत्र किया करता हूँ। मैं सभी भूतों से भिन्न और अविनाशी होते हुए भी जड़स्वरूप होकर उन सभी को अपना ग्रास बना लेता हूँ।
यह जीव कर्मबन्धन की आबद्धता से अनेक रूपों में होकर जड़शरीर धारण करता है, कयोंकि वह अपने कृतकर्मों के फलभोग हेतु ही इस संसार में बार-बार जन्म लेता रहता है। पुनः शुभाशुभ कर्मों का अन्त हो जाने पर उसी आत्मा में विलीन हो जाता है।
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