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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 3
त्यक्त्वा विवादशीलानां मतं दुज्ञनिहेतुकम्‌ । आत्मज्ञानाय भूतानामनन्यगतिचेतसाम्‌ ।।
सभी विवादास्पद मतो और दुर-ज्ञान के मूलभूत कारणों का परित्याग करके आत्मज्ञान का आश्रय ग्रहण करना चाहिए। समस्त जीवों के हितार्थं यही अनन्य गति है।
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