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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 30
इहामुत्र फलद्वेषी सकलं कर्म संत्यजेत् । नित्यनैमित्तिके सङ्गं त्यक्त्वा योगे प्रवर्तते ।।
मनुष्य को इहलोक तथा परलोक के फलों एवं नित्य-नैमित्तिक फलों की इच्छा का परित्याग कर केवल योगाभ्यास की साधना में निरत रहना ही मोक्षप्राप्ति का कारण बनता है।
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