कालत्रयेऽपि न यथा रज्जुः सर्पो भवेदिति तथात्मा न भवेद्धिश्चं गुणातीतो निरञ्जनः ।।
यह बात निश्चित रूप से सत्य है कि तीनों कालों में (भूत, वर्तमान एवं भविष्य) रस्सी कभी भी सर्परूप में परिवर्तित नहीं हो सकती, उसी प्रकार गुणातीत शुद्धात्मा भी कभी विश्वरूप में नहीं बदल सकता।
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