आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं योगशास्त्रं परं मतम् ।।
समस्त शास्त्रावलोकन के पश्चात् यही विचार दृढ़ीभूत होता है कि योगशास्त्र ही एकमात्र परमश्रेष्ठ मत है, क्योंकि बार-बार विचारने पर यही बात सिद्ध होती है।
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