हेयं सर्वमिदं यस्य मायाविलसितं यतः ।
ततो न प्रीतिविषयस्तनुवित्तसुखात्मकः ।।
यह समस्त मिथ्या जगत केवल माया का ही हास-विलास होता है। अतः इसे सुख का साधन न मानकर इसकी प्रीति से मुँह मोड़ लेना चाहिए।
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