भिन्न-भिन्न रूपों में दृष्टिगत होने वाली वस्तुएँ उपाधि-भेद के कारण ही भिन्न प्रतीत होती है, किन्तु यथार्थतः उनमें किसी प्रकार का भेद नहीं होता। उनमें ऐसा भेद केवल विशिष्ट शब्दों के प्रयोग से ही जान पड़ता है।
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