सर्वं च दृश्यते मत्तः सर्वं च मयि लीयते ।
न तद्भिन्नोऽहमस्मिन्नो यद्भिन्नो न तु किंचन ।।
यह सब मुझसे ही उत्पन्न होता और मेरे में ही विलीन हो जाता है। मैं किसी से भित्र नहीं हूँ और न मुझसे ही कुछ भित्र है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण जगत को इसी भावना से देखना और समझना योगाभ्यासी के लिए आवश्यक है।
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