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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 44
दोषनाशे यथा शुक्लो गृह्यते रोगिणा स्वयम् । शुक्लज्ञानात्तथाज्ञाननाशादात्मा तथा कृतः ।।
अज्ञान के नाश होने पर शुद्ध ब्रह्म का बोध उसी प्रकार होने लगता है जिस प्रकार पित्तविकार के नष्ट होने पर शरीर का वर्ण भी श्वेत हो जाता है। तात्पर्य यह है कि अज्ञानरूप रोग का शमन आत्मज्ञानरूप औषध सेवन से ही सम्भव हो पाता है।
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