आत्मा की विभेदता किसी पदार्थ या संसार से नहीं है, किन्तु उसमें भ्रमवश ही दो-तीन इत्यादि की प्रताति होती है। इस प्रकार के भ्रम के मिट जाने पर अनेकता का भेद नहीं रह जाता।
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