मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 24
पुण्यकर्मणि वै स्वर्गों नरकं पापकर्मणि । कर्मबन्धमयी सृष्टिर्नान्यथा भवति ध्रुवम् ।।
अर्थात् मर्त्यलोक में शरीर धारण करने पर मानव द्वारा जाने-अनजाने पाप-पुण्य कर्म होते ही रहते हैं, किन्तु उन शुभाशुभ कर्मों का पूर्ण फल जब तक भुगत नहीं लिया जाता तब तक सांसारिक आवागमन से मुक्ति नहीं मिलती, जैनदर्शन में भी इसी मत का प्रतिपादन किया गया है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिव संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिव संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें