अर्थात् मर्त्यलोक में शरीर धारण करने पर मानव द्वारा जाने-अनजाने पाप-पुण्य कर्म होते ही रहते हैं, किन्तु उन शुभाशुभ कर्मों का पूर्ण फल जब तक भुगत नहीं लिया जाता तब तक सांसारिक आवागमन से मुक्ति नहीं मिलती, जैनदर्शन में भी इसी मत का प्रतिपादन किया गया है।
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