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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 87
सा मायावरणाशक्त्य वृता विज्ञानरूपिणी । दर्शयेज्जगदाकारं तं विक्षेपस्वभावतः ।।
वह इन तीन गुणों में से अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी ग्रहण करती रहती है। इसी को आवरणशक्ति कहते हैं। यह शक्ति जब ज्ञानावरण धारण कर लेती है तब वह स्वतः ही अज्ञानमयी बन जाती है। पुनः यह विक्षेप स्वभावशीला शक्ति जगदाकृति का प्रदर्शन करने लगती है।
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