तथा जगदिदं भ्रान्तिरध्यासकल्पनाजगत् ।
आत्मज्ञानाद्यथा नास्ति रज्जुज्ञानाद्भुजङ्गमः ।।
अर्थात् जगत् में विभिन्नता के रूप में होने वाला भ्रम भी रस्सी में साँप होने के भ्रम के सदृश ही होता है। यह केवल सांसारिक कल्पना ही होती है, इसमें रंचमात्र भी सत्यता नहीं रहती। किन्तु रज्जुज्ञान की तरह आत्मज्ञान के उदय होते ही मिथ्या जगत की प्रतीति नहीं होती।
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