वह कारण से रहित होने के फलस्वरूप कोई कार्य भी नहीं है ओर न तो ब्रह्मादि ईश्वर ही है। वह आत्मा अपने आप में पर्णकाम है अर्थात् वह सभी कामनाओं से परे है। इस प्रकार आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मा मे झांककर देखने वाला ऐसा योगी जो सभी संकल्प-विकल्प का परित्याग कर देता है वही समाधिस्थ हो सकता है।
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