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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 67
आत्मनात्मनि चात्मानं दृष्टवानन्तं सुखात्मकम्‌ । विस्मृत्य विश्वं रमते समाधेस्तीव्रतस्तथा ।।
इस प्रकार का योगसाधक अपने आत्मा से आत्मा को आत्मा में देखता हुआ संसार को विस्मृत कर देता है ओर आनन्दस्वरूपा समाधि में तेजी से रमण करने लग जाता है।
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