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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 31
कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा योगी त्यजेत्सुधीः । पुण्यपापद्वयं त्यक्त्वा ज्ञानकाण्डं प्रवर्तते ।।
कर्मकाण्ड की महत्ता को जान लेने के पश्चात् पाप-पुण्य के कर्मों का परित्याग कर योगसाधना में प्रवृत्त होना चाहिए। श्रुतियों का कथन है कि आत्मा ही श्रवणीय और मननीय है।
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