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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 41
यथा रज्जूरगभ्रान्तिभ्विद्धेदवशाज्जगत्‌ ।।
जिस प्रकार रस्सी को साँप समझ लेने का मिथ्या ज्ञान उत्पत्र होता है उसी प्रकार संसार भी अज्ञान के वशीभूत है।
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