इसी भाँति विधिनिषेध कर्मों (करणीय-अकरणीय कर्म) के मर्मज्ञ व्यक्ति पापकर्मों से विमुख रहकर भी माया के भ्रमजाल में पड़े रहकर पाप-पुण्य के अनुष्ठानरूप उक्त मतों का सहारा लेते रहते हैं।
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