उपाधिषु शरावेषु या संख्या वर्तते परा ।
सा संख्या भवति यथा रवौ चात्मनि तत्तथा ।।
उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत भी एकात्म होते हुए भी अनेक रूपों में परिलक्षित हुआ करता है। यथार्थ में पब्रह्म भी एक ही होता है।
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