उस अद्वैत आत्मा को प्रकाशित करने वाला कोई नहीं होता, बल्कि वह अपनी प्रभा से ही प्रकाशमान रहता है। स्वयं प्रभावान होने के फलस्वरूप ही वह ज्योतिस्वरूप होता है।
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