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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 55
असंलग्न यथाकाशं मिथ्याभूतेषु पञ्चसु । असंलग्नस्तथात्मा तु कार्यवर्गेषु नान्यथा ।।
जिस प्रकार आकाश पंचभूतात्मक होते हए भी उसमें सन्निहित नहीं रहता उसी भाँति आत्मा भी समस्त वस्तुओं में परिव्याप्त रहते हुए भी उसमें लिप्त न होकर पृथक्‌ रूप से स्थित रहता है।
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