कल्पकः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृषात्मिका ।
एतान्मूलं जगदिदं कथं सत्यं भविष्यति ।।
यह समस्त जगत अविद्या का ही एक काल्पनिक रूप है जिसकी नीव ही असत्य पर आधारित हो वह स्वयं सत्य किस प्रकार से हो सकता है?
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