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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 103
जडात्स्वकर्मभिर्बद्धो जीवाख्यो विविधो भवेत् । भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्माण्डाख्ये पुनः पुनः । जीवश्च लीयते भोगावसाने च स्वकर्मणः ।।
यह जीव कर्मबन्धन की आबद्धता से अनेक रूपों में होकर जड़शरीर धारण करता है, कयोंकि वह अपने कृतकर्मों के फलभोग हेतु ही इस संसार में बार-बार जन्म लेता रहता है। पुनः शुभाशुभ कर्मों का अन्त हो जाने पर उसी आत्मा में विलीन हो जाता है।
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