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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 35
जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा भवेत् । एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्भेदोऽत्र न दृश्यते ।।
जिस प्रकार जल से परिपूरित घड़े में एक ही सूर्य के अनेक प्रतिविम्ब भासित होते हैं, किन्तु यथार्थतः वे अनेक न होकर केवल एक ही होते हैं। उनमें अनेकता का आभास तो मिट्टी के घड़े और उनकी संख्याओं के कारण होते हैं।
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