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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 85
पृथ्वी शीर्णा जले मग्ना जलं मग्नं च तेजसि । लीनं वायौ तथा तेजो व्योम्नि वातो लयं ययौ । अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पदे ।।
जैसे पृथिवी जल में निमग्न हो जाती और जल में अग्नि का विलय हो जाता है वैसे ही अग्नि का वायु में और वायु का आकाश में विलयन सुनिश्चित होता है। तदनन्तर वह आकाश भी अविद्या में विलीन हो जाता है और अविद्यास्वरूप माया महाकाश में पहुँचकर अर्थात् परमपद में जाकर विलुप्त हो जाती है। अर्थात् पंच भूतात्मक जगत अपने-अपने कारणों में लय को प्राप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था आने पर केवल एक ब्रह्म ही शेष रह जाता है।
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