इसका तात्पर्य यह है कि मिथ्या माया से आविर्भूत यह सृष्टि भी मिथ्या ही है। विद्या का सम्बन्ध शुद्ध ब्रह्म में होना स्वाभाविक है और उस ब्रह्म के तेजांश से ही आकाश-मण्डल का आविर्भाव हुआ है।
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