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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 37
यथैकः कल्पकः स्वप्ने नानाविधतयेष्यते । जागरेऽपि तथाप्येकस्तथैव बहुधा जगत् ।।
जिस प्रकार स्वप्नावस्था में मानव-मन में अनेक प्रकार की परिकल्पनाएँ उठती रहती है, किन्तु नींद खुल जाने पर कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, उसी प्रकार मायाग्रस्तता के फलस्वरूप जगत भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता है।
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