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शिव संहिता • अध्याय 1 • श्लोक 33
दुरितेषु च पुण्येषु यो धीवृत्तिं प्रचोदयात् । सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्वं चराचरम् ।।
जिस बुद्धि के कारण पाप-पुण्य, इन दोनों में समान रूप से प्रेरणा मिलती है, 'वह मैं ही हूँ'- मुझसे ही इस जगत की उत्पत्ति होती है। यह समस्त दृश्यमान जगत मैं ही हूँ।
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